बचपन - 2021
दुआ की थी मैंने बचपन में की जल्दी से बड़ा हो जाऊ, आज सोचता हूं ना जाने क्या सोचकर मैंने वो दुआ की थी ।
वो दिन भी क्या दिन हुआ करते थे जब हम बच्चे हुआ करते थे और हमारी सारी गलतियां हमारी नादानी समझ कर माफ कर दी जाती थी
ना पैसे का मोह ना ही घर की जिम्मेदारियां सुबह उठते ही उछल कूद शुरू और रात को सोने से पहले तक शैतानियां, ना ही गुजरे हुए कल से कोई शिकवा ना आज की कोई जिम्मेदारी और ना आने वाले कल की फिर्क
वो बचपन की यादें जब हमने पहली बार अपने पापा कि उंगली पकड़ कर स्कूल जाना सीखा था रोज सुबह सिर्फ इस लिए स्कूल जाते कि एक रुपए मिलेंगे और क्लास में कार्टून वाली बॉटल और वो बड़ा वाला बॉक्स जिस लड़के के पास हो उसे अंबानी मान लेना जादू वाली पेंसिल को अपनी अमानत समझना रोज अपने बगल मे बैठे लड़के को अपना टिफिन शेयर करना, स्कूल से आते ही झट खेलने लगना वो भी एक दिन हुआ करते थे
दूध से ना जाने क्या दुश्मनी थी कि उसे पीने में नानी याद आ जाती
हमे पता होता था बाहर खेलने गए और कपड़े गंदे हुए तो घर में बहुत कायदे से कपड़ों के साथ-साथ हमारी भी धुलाई होगी फिर भी रोज खेलने जाना और कपड़े गंदे करके घर आना हमारी आदतों में शामिल था
हमे बहुत सी बाते रोज समझाई जाती जैसे कि कोई आए तो उसको जो भी खाने पीने को दिया जाए उसे हाथ ना लगाना नहीं उसके जाने के बाद बहुत मार पड़ेगी फिर भी किसी महमान के आने पे उससे पहले ही नाश्ता शुरू कर देना ये हमारी पहचान हुआ करती थी वो जाने पे 10रुपए दे जाते और उसे मम्मी को देकर उनसे बदले में 1 या 2 रुपए लेना आज 1000-500 मिलने पर भी वो खुशी नहीं आ पाती ।
गाड़ी में आगे बैठ जो फीलिंग आती और धोखे से हैंडल पकड़ने को मिल जाए तो फिर क्या ही बात ऐसा लगने लगता की गाड़ी हमही चला रहे है
जब कहीं जाते तो खिड़की वाली सीट में बैठ बाहर पूरी रास्ते देखना ये भी ये एक पहलू हुआ करता था
बुआ या नानी के घर जाने में जो खुशी मिलती और वहा जो खुलकर शैतानी करने को मिलती उसका मज़ा ही कुछ और था
वो दिन भी अपने आप में कमाल थे जब मार खाने के बाद ये धमकी दी जाती की रोए तो और मार खाओगे
हर किसी को अपना स्कूल बताना अपनी क्लास वाली मैम के बारे में बताना अपने दोस्त का घर बताना और अपने सारे खिलौने दिखाना ये सब भी हमारे घर कोई आता तो हम बताना बहुत जरूरी समझते थे
कितना खूबसूरत हुआ करते थे बचपन के वो दिन, सिर्फ दो उंगलियां जुड़ने से दोस्ती फिर से शुरू हो जाया करती थी
बचपन में हमे कुछ भ्रम भी हुआ करते थे जैसे पेंसिल के छिलके को इकट्ठा करके उसमे दूध और मलाई डालने से रबर बन जाएगी
साधू लोग बच्चे पकड़ ले जाते है
टीवी के अंदर लोग होते है और सबसे बड़ा भ्रम बड़े होके जिंदगी बहुत अच्छी हो जाएगी।
कभी कभी लगता है कहा आ गए इस समझदारी के दलदल में, वो नादान बचपन भी कितना प्यारा था ।






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